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कुछ रूह से, कुछ मन की... (Edition1st) - Tapa blanda

प्रसन्न

 
9789372131819: कुछ रूह से, कुछ मन की... (Edition1st)

Sinopsis

कभी ऐसा लगता है कि बहुत कुछ कहना है, पर लफ़्ज़ साथ नहीं देते। कुछ एहसास दिल में कहीं रह जाते हैं - यादों में, ख़ामोशी में, या किसी शाम की चाय में। ये किताब ऐसे ही जज़्बातों का एक सफ़र है - जो दिल से निकले हैं, और दिल तक पहुँचने की चाह रखते हैं। हर नज़्म, हर कविता, एक कोशिश है उन बातों को कहने की - जो पहले भी कही गई हों, लेकिन शायद इस तरह नहीं। अगर आपने कभी ख़ुद में कुछ खोया है, या अल्फ़ाज़ में अपना अक्स ढूंढा है - तो हो सकता है ये किताब आपके लिए ही लिखी गई हो।

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Acerca del autor

प्रसन्न एक ऐसे क़लमकार हैं, जो जज़्बातों को बहुत सादगी और सच्चाई से बयान करते हैं। उनकी बातें दिल से निकलती हैं और सीधे दिल तक पहुँचती हैं। उन्होंने अकेलेपन, तलाश और अंदर की ख़ामोशियों को अपने लफ़्ज़ों में महसूस किया है। उनका मानना है कि हर किसी के अंदर कुछ अनकहे एहसास होते हैं - जो सिर्फ़ कहे जाने का इंतज़ार करते हैं। यह उनकी पहली किताब है - एक कोशिश उन लफ़्ज़ों को आवाज़ देने की, जो कभी रुक गए थे।

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